मुल्ला बूढ़े हो गए। मौत का समय नजदीक आया। उन्होंने वसीयत लिखवाई। लोग सोच रहे थे—अब यह आदमी कुछ गंभीर बात कहेगा। हर आदमी मौत के समय गंभीर हो जाता है। लेकिन मुल्ला, मुल्ला ही थे।
उन्होंने वसीयत में लिखवाया—“मेरी कब्र पर कोई दीवार न बनाई जाए। कोई छत न हो। सिर्फ एक दरवाजा बनाया जाए। दरवाजे पर एक बड़ा ताला लगाया जाए। और उस ताले की चाबी समुद्र में फेंक दी जाए।”
वैसा ही किया गया। आज भी वह कब्र वैसी ही है—अकेला एक दरवाजा खड़ा है, ताला लगा हुआ है, चाबी समुद्र की गहराई में कहीं पड़ी है। लोग आते हैं, बंद ताला देखते हैं, उदास होते हैं, हाथ जोड़ते हैं, लौट जाते हैं। कोई यह नहीं सोचता कि दीवार तो है ही नहीं—बगल से निकल जाओ।
यह मुल्ला का आखिरी मजाक है और सबसे बड़ा उपदेश भी। क्योंकि धर्म के साथ भी यही हुआ है। ईश्वर के पास कोई दीवार नहीं। कहीं कोई रुकावट नहीं। प्रवेश वहीं से है जहाँ तुम खड़े हो। लेकिन आदमी ने दरवाजे बनाए, ताले लगाए और चाबी खो दी—या यूँ कहो कि पुजारियों के हवाले कर दी। और अब पूरी दुनिया उन बंद दरवाजों के सामने खड़ी है। कोई कहता है चाबी काबा में है, कोई कहता है काशी में, कोई येरुशलम में। लड़ाइयाँ हो रही हैं, खून बह रहा है, सिर कट रहे हैं—एक ऐसे ताले की चाबी के लिए जो एक ऐसे दरवाजे पर लगा है जिसके चारों तरफ दीवार ही नहीं। और मुल्ला कब्र में लेटे हँस रहे हैं। वे मौत के बाद भी सिखा रहे हैं—“बेटे, बंद दरवाजों को इतना गंभीर मत लो। बगल से देखो—दीवार कभी थी ही नहीं। धर्म कोई दरवाजा नहीं जिससे गुजरना है। धर्म वह खुला मैदान है जिसमें तुम पहले से खड़े हो। तुमने आँखें बंद करके एक दरवाजा कल्पना कर लिया था।”
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