बनारस की गलियाँ थीं। गंगा बह रही थी। शाम का समय था। एक युवक अपनी छत पर बैठा था। उम्र पच्चीस-छब्बीस की होगी। माथे पर तिलक, आँखों में एक अजीब सी चमक और हाथ में कलम। वे लिख रहे थे — पर लिखते-लिखते कभी मुस्कुरा देते, कभी आँखें भर आतीं।
पड़ोस की बुढ़िया ने पूछा — “बाबू जी! आज क्या लिख रहे हो?”
युवक ने सिर उठाया। मुस्कुराए और बोले — “माई! हिन्दी लिख रहा हूँ… भारत लिख रहा हूँ… और कभी-कभी प्रभु को भी याद कर लेता हूँ।”
वे युवक थे — भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र।
उनका जन्म सन् 1850 में काशी के एक सम्पन्न वैश्य परिवार में हुआ। पिता गोपालचन्द्र जी स्वयं कवि थे। घर में साहित्य और भक्ति का वातावरण था। पर बालक हरिश्चन्द्र में कुछ और ही बात थी। वे बचपन से ही संवेदनशील थे। गरीब को देखकर उनका हृदय पिघल जाता, अन्याय देखकर खून खौल उठता।
पंद्रह वर्ष की उम्र में पिता का देहांत हो गया। परिवार का बोझ कंधों पर आ पड़ा। पर उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने ठान लिया — हिन्दी को उसकी सही जगह दिलानी है। उस समय अंग्रेजी और उर्दू का बोलबाला था। हिन्दी को लोग “गँवारू भाषा” समझते थे। भारतेन्दु ने उसी भाषा को अपना हथियार बनाया।
वे लिखने लगे — नाटक, कविता, निबंध, यात्रा-वृत्तांत। “अन्धेर नगरी”, “भारत दुर्दशा”, “वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति” — एक के बाद एक रचनाएँ निकलने लगीं। उनकी कलम में जादू था। वे हँसाते भी थे और रुलाते भी थे। समाज की कुरीतियों पर उन्होंने इतनी तीखी चोट की कि लोग चौंक उठे।
पर केवल देश और समाज की पीड़ा ही उनके भीतर नहीं थी। एक गहरी भक्ति भी बसती थी। कृष्ण के प्रति, राम के प्रति, अवतारों के प्रति।
एक शाम वे फिर छत पर बैठे थे। आँखें बंद कीं। मन में जयदेव का गीत-गोविन्द गूँज रहा था। राधा-माधव की वही मधुर लीला, वही विरह, वही मिलन। अचानक उनके मुख से निकली एक वंदना — मानो स्वयं अवतारों को पुकार रहे हों। उन्होंने जयदेव के भावों को हिन्दी की कोमलता में पिरोया और “गीत-गोविंदानंद” की रचना की। उसी भाव से उनकी अवतार-वंदना निकली —
जय जय देव हरे!श्रित-कमला-कुच-मण्डल, धृत-कुण्डल ए।
कलित-ललित-वनमाल, जय जय देव हरे॥
दिनमणि-मण्डल-मण्डन, भव-खण्डन ए।
मुनिजन-मानस-हंस, जय जय देव हरे॥
कालिय-विष-धर-गंजन, जन-रंजन ए।
यदु-कुल-नलिन-दिनेश, जय जय देव हरे॥
मधु-मुर-नरक-विनाशन, गरुडासन ए।
सुर-कुल-केलि-निदान, जय जय देव हरे॥
अमल-कमल-दल-लोचन, भव-मोचन ए।
त्रिभुवन-मङ्गल-नाम, जय जय देव हरे॥
जब कोई उनसे पूछता — “बाबू जी! आप देश की दुर्दशा लिखते हो, समाज की कुरीतियाँ लिखते हो, फिर यह भक्ति के पद कहाँ से आ जाते हैं?”
तो भारतेन्दु धीरे से उत्तर देते —
“भाई! देश भी तो उसी प्रभु की लीला है। जब हृदय में राम-कृष्ण बसते हैं, तभी कलम में भारत बसता है। भक्ति और देशभक्ति अलग-अलग नहीं। एक ही नदी के दो किनारे हैं।”
वे सिर्फ लेखक नहीं थे। वे आंदोलन थे। युवकों को इकट्ठा किया, उन्हें लिखना सिखाया। “हिन्दी नए चाल में ढली” — यह नारा उन्होंने ही दिया। उन्होंने दिखाया कि हिन्दी केवल भक्ति और रीति की भाषा नहीं, बल्कि समाज सुधार, देशभक्ति और आधुनिक विचारों की भी भाषा हो सकती है।
पर शरीर साथ नहीं दे रहा था। अत्यधिक परिश्रम और संवेदनशीलता ने उन्हें अंदर से खोखला कर दिया। सन् 1885 में, मात्र पैंतीस वर्ष की आयु में, उस दीपक ने विदा ले ली।
जब समाचार फैला तो पूरा काशी शोक में डूब गया। लोग कहने लगे — “आज भारत का एक सच्चा बेटा चला गया।”
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को सूल॥”
और कभी-कभी काशी की हवा में उनकी वह अवतार-वंदना भी सुनाई दे जाती है —
जय जय देव हरे…जय जय देव हरे…
भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र केवल साहित्यकार नहीं थे। वे उस युग की चेतना थे, जिसने सोए हुए भारत को जगाने का प्रयास किया। उनकी कथा हमें याद दिलाती है कि कलम भी तलवार से तेज हो सकती है — बशर्ते उसमें देश, भाषा और प्रभु का प्रेम एक साथ हो।
जय भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र!जय हिन्दी!
जय अवतार-वंदना!
जय भारत!
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