April 14, 2026

उल्टा बैठना गधे पर

एक दिन लोगों ने देखा—मुल्ला अपने गधे पर उल्टे बैठे हैं। चेहरा पीछे की तरफ, पीठ आगे की तरफ। लोग हँसने लगे। किसी ने कहा, “मुल्ला, तुम उल्टे बैठे हो!”

मुल्ला बोले, “मैं उल्टा नहीं बैठा। गधा उल्टा खड़ा है।”

लोग और जोर से हँसे। किसी ने कहा, “ठीक है, सच बताओ क्यों ऐसे बैठे हो?”

मुल्ला बोले, “सुनो। अगर मैं सीधा बैठूँ तो मेरी पीठ तुम्हारी तरफ होगी। अगर गधा मुँह घुमा ले तो उसकी पीठ तुम्हारी तरफ। यही एक तरीका है जिसमें न मेरी पीठ दिखे, न उसकी। मैं तुम्हारा सम्मान कर रहा हूँ।”

यह मजाक है लेकिन इसमें एक रहस्य छिपा है। मनुष्य अपनी हर मूर्खता का सुंदर तर्क खोज लेता है। यह मन की सबसे बड़ी कारीगरी है। मन एक तर्क मशीन है। लेकिन याद रखना—वह सत्य खोजने के लिए तर्क नहीं बनाता। वह पहले वह करता है जो करना चाहता है, फिर उसके लिए तर्क गढ़ता है। तुम गुस्सा हुए—गुस्सा पहले आया, तर्क बाद में “मैंने उसके भले के लिए डाँटा।” लोभ किया—लोभ पहले, तर्क बाद में “परिवार के लिए कमाता हूँ।” किसी की निंदा की—निंदा पहले, तर्क बाद में “मैं सच बता रहा था।” आदमी वही करता है जो करना चाहता है, फिर मन वकील की तरह खड़ा होकर इतना सुंदर तर्क देता है कि तुम खुद मान जाते हो कि सही थे। मुल्ला ने गधे पर उल्टे बैठने का इतना बढ़िया तर्क दिया कि लोग सोच में पड़ गए—शायद सच में सम्मान कर रहे हों। तुम्हारे साथ भी यही हो रहा है। हर दिन, हर घंटे तुम्हारा मन इतने सुंदर तर्क देता है कि तुम अपनी हर मूर्खता को संतता मान लेते हो। समाधान क्या है? कारण आने से पहले देख लेना। जिस पल कुछ करने का मन हो, तर्क आने से पहले देख लो। एक बार तर्क आ गया तो जो दिखेगा वह सच नहीं, सिर्फ न्यायसंगत होगा। यही चेतना का मतलब है—अपने ही मन के वकील की बात सुनने से इनकार करना।

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