April 13, 2026

नाव में व्याकरण और तैरना

मुल्ला नाव से नदी पार कर रहे थे। साथ में एक बड़ा विद्वान बैठा था—भाषा का महान ज्ञानी। बातचीत में विद्वान ने मुल्ला की भाषा में कुछ गलतियाँ पकड़ीं। पूछा, “मुल्ला, तुमने कभी व्याकरण पढ़ी है?”

मुल्ला बोले, “नहीं।”
विद्वान ने दुखी स्वर में सिर हिलाया, “तो तुम्हारी आधी जिंदगी बर्बाद हो गई।”

मुल्ला चुप रहे। थोड़ी देर बाद तूफान आ गया। लहरें ऊँची होने लगीं, नाव डगमगाने लगी, एक तरफ झुक गई और पानी भरने लगा।

अब मुल्ला ने पूछा, “पंडित जी, बताइए, आपको तैरना आता है?”
विद्वान घबराए हुए बोले, “नहीं, नहीं आता।”
मुल्ला बोले, “तो आपकी पूरी जिंदगी बर्बाद हो गई। मेरी तो आधी ही गई थी।” और पानी में कूद गए।

छोटी कहानी है लेकिन पूरा रहस्य खोल देती है। जानकारी और जीवन की कला में फर्क यही है। व्याकरण जीवन की सजावट है, तैरना जीवन की जरूरत। सजावट तब तक काम आती है जब तक नाव चल रही हो। जिस पल नाव डूबने लगे, सजावट बेकार। और हर किसी की नाव एक दिन डूबेगी। यह संभावना नहीं, निश्चितता है। एक दिन तूफान आएगा, नाव झुकेगी, पानी भरेगा। उस दिन तुम्हारी उपाधियाँ, याद किए श्लोक, पद, धन, नाम—कुछ काम नहीं आएंगे। सिर्फ एक चीज काम आएगी—क्या तुमने भीतर तैरना सीख लिया है? भीतर का तैरना ध्यान है, साक्षी भाव है—चारों तरफ तूफान हो फिर भी शांत रहने की क्षमता। यह किताबों से नहीं आता, सुनने से भी नहीं। जैसे तैरना—हजार किताबें पढ़ लो, पानी में उतरे बिना नहीं आएगा। और एक बार आ जाए तो कभी नहीं भूलता। ध्यान भी ऐसा ही है। उतरना पड़ेगा। पहले दिन डर लगेगा, हाथ-पैर पटकोगे, नाक में पानी जाएगा। लेकिन एक दिन अचानक पानी खुद सँभाल लेगा। और उस दिन तुम हँसोगे—अरे, इतना आसान था! डूबने में मेहनत लगती है, तैरना पानी खुद सिखा देता है।

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