मुल्ला का लिखा इतना खराब था कि खुद नहीं पढ़ पाते थे। पढ़ाई में भी कमजोर थे, लेकिन गाँव में और लोग उनसे भी कम पढ़े-लिखे थे, इसलिए वे गाँव के विद्वान माने जाते थे।
एक दिन एक आदमी आया, “मुल्ला, मेरे भाई को पत्र लिख दो। वह दूर विदेश में है।”
मुल्ला बैठे, कलम उठाई, लंबा पत्र लिखा। आदमी बोला, “जरा पढ़कर सुना दो, कहीं कुछ छूट तो नहीं गया।”
मुल्ला ने कागज उठाया। ऊपर लिखा था—“मेरे प्रिय भाई…” उसके आगे कुछ समझ नहीं आया। कागज इधर घुमाया, उधर घुमाया, पास लाए, दूर किया—एक शब्द भी नहीं पढ़ सके।
आदमी हैरान, “यह अजीब बात है। अभी अपनी ही हाथ से लिखा और पढ़ नहीं पा रहे। फिर दूसरा आदमी कैसे पढ़ेगा?”
मुल्ला बोले, “भाई, यह मेरी समस्या नहीं। मेरा काम लिखना था, सो लिखा। पढ़ना मेरा काम नहीं।”
गाँव वाला सोच में पड़ गया, फिर सिर हिलाया, “तुम सही कह रहे हो। और फिर पत्र तुम्हारे लिए है भी नहीं।”
इस कहानी में दो मूर्ख हैं और दूसरा पहले से बड़ा है। पहला वह जो लिख रहा है और खुद नहीं जानता क्या लिख रहा है। दूसरा वह जो इस तर्क से संतुष्ट हो गया। हजारों साल से यही हो रहा है। धर्मगुरु वे बातें बोल रहे हैं जो उन्होंने खुद कभी अनुभव नहीं कीं। ईश्वर के बारे में बोल रहे हैं जिसे कभी छुआ नहीं। स्वर्ग-नरक का नक्शा बता रहे हैं जहाँ कभी गए नहीं। ध्यान समझा रहे हैं जो कभी किया नहीं। और श्रोता संतुष्ट हैं—क्योंकि श्रोता भी सोच रहा है कि मुझे जीना नहीं है, सिर्फ सुनना है। लेखक कहता है पढ़ना मेरा काम नहीं, श्रोता कहता है जीना मेरा काम नहीं। और पूरी परंपरा ऐसे ही चलती रहती है—एक ऐसा पत्र जो न लेखक समझता है न पाठक, फिर भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है। तुम भी वही मंत्र दोहरा रहे हो जो तुम्हारे बाप ने दोहराया, उसके बाप ने दोहराया। कभी किसी ने नहीं पूछा—इसका मतलब क्या है? इसे जीने का तरीका क्या है? धर्म तभी जीवित होता है जब कोई खड़ा होकर कहे—मैं यह पत्र उधार नहीं लूँगा। मैं खुद लिखूँगा और जो लिखूँगा उसे खुद पढ़ भी सकूँगा।
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