एक रात मुल्ला ने सपना देखा। सपने में एक आदमी खड़ा था, हथेली में सोने की अशर्फियाँ। वह एक-एक करके मुल्ला की हथेली पर रख रहा था—एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह, सात, आठ, नौ—और रुक गया।
मुल्ला बोले, “अरे भाई, नौ क्यों? दस कर दो। नौ तो गिनती है, दस हो जाए।”
आदमी बोला, “नहीं, सिर्फ नौ मिलेंगी।”
मुल्ला अड़े रहे, “एक और दे दो।”
आदमी नहीं माना। मुल्ला इतने जोर से चिल्लाए कि नींद खुल गई। आँखें खोलीं—हथेली खाली। नौ भी चली गईं।
मुल्ला ने तुरंत आँखें बंद कीं, हथेली फैलाई और बोले, “ठीक है भाई, नौ ही सही। शून्य भी चलेगा, लेकिन दे दो।” सपना वापस नहीं आया।
इस कहानी में मनुष्य की पूरी त्रासदी छिपी है। पहला—लोभ। नौ मिल रही थीं, हाथ में थीं, लेकिन मन बोला “दस क्यों नहीं?” और यह कभी खत्म नहीं होता। दस मिल जाएँ तो सौ चाहिए, सौ मिल जाएँ तो हजार। मन की गणित बड़ी अजीब है। जो मिल चुका उसे शून्य मान लेता है, जो नहीं मिला उसी को देखता रहता है। इसलिए अमीर भी गरीब रहता है—उसकी निगाहें उस एक सिक्के पर टिकी होती हैं जो नहीं मिला। दूसरी बात—आँखें खुलीं तो नौ भी नहीं बचीं। तुमने जो इकट्ठा किया—धन, पद, नाम, प्रतिष्ठा—सब सपने की दौलत है। मृत्यु आँखें खोलेगी और उस पल तुम्हारी हथेली खाली मिलेगी। तीसरी और सबसे मार्मिक बात—आँखें खुलने पर मुल्ला ने क्या किया? फिर से बंद कर लीं। सत्य का एक पल दिखा कि हथेली खाली है, सब सपना था। लेकिन उस वास्तविकता का सामना करने के बजाय उन्होंने फिर आँखें बंद कर लीं और सौदाबाजी शुरू कर दी। तुम्हारी जिंदगी में भी ऐसे पल आते हैं—किसी की मौत पर, किसी बड़े दुख में—अचानक झलक मिलती है कि सब व्यर्थ है। लेकिन कुछ दिन बाद तुम फिर वही दौड़ शुरू कर देते हो। आँखें फिर बंद कर लेते हो।
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