September 08, 2026

भक्त शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी

जय श्री राम!  

रात का अंतिम प्रहर था। काशी की गलियाँ सोई पड़ी थीं। गंगा की लहरें धीरे-धीरे किनारे से बातें कर रही थीं। एक वृद्ध संत अपनी कुटिया में बैठे थे। हाथ में माला थी, पर माला के मनके रुक-रुक कर चल रहे थे। आँखें बंद थीं, पर दृष्टि कहीं बहुत दूर थी — त्रेता युग में, अयोध्या की उन गलियों में, जहाँ राम चलते थे।  

वे संत थे — गोस्वामी तुलसीदास।  

उनका जीवन स्वयं एक महाकाव्य था। जन्म से ही असामान्य। कहा जाता है कि जब वे माँ की कोख से आए तो बारह महीने पूरे हो चुके थे। मुख से पहला शब्द निकला — “राम”। परिवार ने इसे अशुभ माना। बालक को त्याग दिया गया। जंगल की ठंडी हवाओं में एक माँ का हृदय तड़प रहा था, पर संसार ने उस बालक को ठुकरा दिया।  

पर प्रभु की लीला और होती है। उसी वन में एक भक्त नारी ने उस रोते हुए शिशु को उठाया। स्तनपान कराया, राम-नाम सिखाया। बाद में स्वामी नरहरिदास जी ने उसे शिष्य बनाया। बालक बड़ा हुआ। शरीर दुर्बल था, पर आँखों में एक अजीब चमक थी — मानो वे पहले से ही किसी को खोज रहे हों।

युवावस्था आई। विवाह हुआ रत्नावली से। तुलसी अब गृहस्थ थे। पत्नी के प्रति आसक्ति इतनी बढ़ गई कि एक बार रत्नावली मायके चली गई तो वे रात के अंधेरे में नदी पार कर उसके पास पहुँच गए। शरीर भीग चुका था, साँसें फूल रही थीं। रत्नावली ने दीपक की रोशनी में उन्हें देखा और कुछ क्षण मौन रही। फिर बोली — आवाज में प्रेम था, पर शब्दों में वज्र —

“अस्थि चर्म मय देह यह, तासों ऐसी प्रीति।  

तैसी जो श्रीराम से, होत न तो भवभीति॥”

तुलसी जैसे बिजली से बाज आए हों। पत्नी के ये शब्द उनके हृदय में तीर की तरह उतरे। उसी क्षण उन्होंने देखा — अपनी आसक्ति कितनी छोटी है, और राम कितने बड़े। उन्होंने कुछ नहीं कहा। चुपचाप बाहर निकले। पीछे मुड़कर नहीं देखा।  

उस रात तुलसीदास मर गए। और एक नया तुलसी जन्म लिया — वैरागी, राममय।

अब वे भटकने लगे। काशी, अयोध्या, चित्रकूट। कहीं बैठते तो रामकथा सुनते, कहीं स्वयं कहने लगते। पर मन में एक तड़प थी — लोगों तक राम को पहुँचाना। संस्कृत जानने वाले पंडित तो रामायण पढ़ लेते थे, पर साधारण जन? स्त्रियाँ, बच्चे, किसान, वैश्य — उनके लिए रामकथा कठिन भाषा में बंद थी।  

एक दिन अयोध्या में बैठे-बैठे उनके मुख से धारा बहने लगी। चौपाई निकलने लगीं। दोहे निकलने लगे। हाथ में कुछ नहीं था, पर हृदय में मानस उमड़ रहा था। उन्होंने लिखना शुरू किया —  

“जो सुमिरत सिधि होई गननायक करिबर बदन।  

करउ अनुग्रह सोई बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥”

और फिर शुरू हुआ वह अमिट ग्रन्थ — श्रीरामचरितमानस।  

कहा जाता है कि जब वे लिखते थे तो रात के अंधेरे में एक वृद्ध ब्राह्मण आकर बैठ जाते और कथा सुनते। एक दिन तुलसीदास ने पूछा — “आप कौन हैं?” वृद्ध मुस्कुराए और बोले — “मैं वही हूँ जिसे तुम दिन-रात पुकारते हो।” और तिरोहित हो गए। शंकर स्वयं आकर अपनी ही कथा सुन रहे थे।

काशी में जब मानस की रचना पूरी हुई तो पंडितों में हलचल मच गई। “यह तो भाषा में है! यह शास्त्र कैसे हो सकता है?” विरोध बढ़ने लगा। तब एक दिव्य घटना घटी। रात को विश्वनाथ मंदिर में भगवान और माँ अन्नपूर्णा ने स्वप्न में कई पंडितों को दर्शन दिए और कहा — “तुलसी की वाणी मेरी वाणी है। जो इसे अस्वीकार करेगा, वह मेरी कृपा से वंचित रहेगा।”  

दूसरे दिन मानस को सर्वोच्च आसन मिला।

तुलसीदास अब केवल कवि नहीं रह गए थे। वे भक्त शिरोमणि बन चुके थे। हनुमान जी के दर्शन हुए। राम-दरबार की झाँकी मिली। उनकी विनयपत्रिका में जो पीड़ा और प्रार्थना है, वह किसी साधारण मनुष्य की नहीं लगती — मानो कोई बहुत पुराना भक्त अपनी हारी-थकी आत्मा लेकर प्रभु के चरणों में गिर रहा हो।

अंतिम समय निकट आया। शरीर शिथिल होने लगा। पर मुख पर शांति थी। उन्होंने अपनी अंतिम चौपाई कही और नेत्र मूंद लिए। कमरे में राम-नाम गूँज रहा था।  

आज सदियाँ बीत गईं। पर जब भी कोई व्यक्ति अपने जीवन के अंधेरे में रामचरितमानस खोलता है, तो लगता है मानो तुलसीदास जी स्वयं बैठे हों और कह रहे हों —  

“बिनु सतसंग न हरिकथा तेहि बिनु मोह न भाग।  

मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग॥”

वे चले गए, पर उनकी वाणी रह गई। और जब तक यह वाणी जीवित है, तुलसीदास भी जीवित हैं — हर उस हृदय में जहाँ राम बसते हैं।

जय भक्त शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी!  

जय सिया-राम!  

जय भक्तमाल!

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