September 06, 2026

कच्छ के महान् भक्त दादा मेकण

जय सन्त मेकण दादा!  

कच्छ का रण… जहाँ तक नज़र जाती है, वहाँ केवल धूल, धूप और मौत की खामोशी। गर्मी इतनी कि साँसें जलने लगें, और रास्ता इतना भटकाने वाला कि आदमी अपना ही साया खो बैठे। उसी रण के किनारे, एक गाँव था — ध्रंग। और उसी ध्रंग में जिया करते थे एक संत, जिन्हें लोग प्यार से दादा मेकण कहते थे।

दादा मेकण राजपूत वंश के थे। पिता का नाम हरध्रोलजी और माता का नाम पबांबा। बचपन से ही उनका मन संसार से उखड़ा-उखड़ा रहता। बारह वर्ष की उम्र में उन्होंने आशापुरा माता के मंदिर में जाकर कापड़ी संप्रदाय के गुरु गंगाराजा से दीक्षा ले ली। फिर तो वे वैरागी हो गए।  

पर उनका वैराग्य बैठकर जप-तप करने वाला नहीं था। उनका वैराग्य सेवा का था।

दादा के पास दो अनमोल साथी थे — एक गधा, जिसका नाम था लालाराम (लालियो), और एक कुत्ता, जिसका नाम था मोतीराम (मोतियो)। हर सुबह दादा लालाराम की पीठ पर पानी की मशकें लादते, दोनों बगल में ठंडे पानी के घड़े बाँधते, सिर पर एक खाली बर्तन रखते और मोतीराम को आगे करके रण की ओर निकल पड़ते।

रण में जो भी मुसाफिर प्यासे, भूखे, रास्ता भटके हुए मिलते — दादा उन्हें पानी पिलाते, रोटी खिलाते, रास्ता बताते और फिर चुपचाप आगे बढ़ जाते। हजारों यात्रियों ने उनकी इस सेवा से प्राण बचाए। हिंदू हो या मुसलमान, अमीर हो या गरीब — दादा के लिए सब एक थे। उनके ठिकाने पर मुसाफिरखाना जैसा माहौल बन गया था। थके हुए लोग वहाँ विश्राम करते, और दादा उनकी सेवा में जुटे रहते।

कहा जाता है कि दादा ने अलग-अलग स्थानों पर बारह-बारह वर्ष तक धूनी रमाकर तपस्या की। बिलखा, जंगी, लोदाई और अंत में ध्रंग — हर जगह उनकी धूनी जलती रही। तपस्या के साथ-साथ जनसेवा भी अनवरत चलती रही। उनकी वाणी में कबीर जैसी सरलता और निर्भीकता थी। लोग उन्हें “कच्छ का कबीर” कहने लगे।

समय बीतता गया। दादा की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। पर वे वैभव से दूर ही रहे। गधा और कुत्ता ही उनके सच्चे साथी थे। मोतीराम इतना प्रशिक्षित था कि वह भटके हुए मुसाफिरों को सूँघकर खोज लेता और लालाराम को उनके पास ले जाता।

अंत समय निकट आया। संवत् 1786 की आश्विन वदी चतुर्दशी के दिन दादा ने जीवित समाधि लेने का निश्चय किया। उस दिन उनके ग्यारह शिष्यों ने भी उनके साथ समाधि लेने की इच्छा जताई। दादा मुस्कुराए और स्वीकार कर लिया। उसी दिन विभिन्न स्थानों पर उनके कुल इकतालीस अनुयायियों ने भी जीवित समाधि ले ली।  

ध्रंग में आज भी दादा मेकण की समाधि है। उनके साथ लालाराम और मोतीराम की भी समाधियाँ बनी हुई हैं। हर वर्ष महाशिवरात्रि पर वहाँ विशाल मेला लगता है। हजारों श्रद्धालु — हिंदू और मुसलमान दोनों — वहाँ पहुँचते हैं। भजन गूँजते हैं, और लोग याद करते हैं उस संत को, जिसने रण की मौत को जीवन में बदल दिया था।

दादा मेकण की कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति केवल मंदिर या माला में नहीं होती। सच्ची भक्ति तो उस प्यासे मुसाफिर को पानी पिलाने में है, जो रण में राह भूल चुका हो। सेवा ही सबसे बड़ा जप है, और करुणा ही सबसे बड़ी तपस्या।

आज भी जब कच्छ के रण में कोई राही रास्ता भटकता है, तो लोग कहते हैं —  

“मार्गा बतावे दादा मेकण…”

जय दादा मेकण!  

जय लालाराम!  

जय मोतीराम!  

जय कच्छ की धरती!

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