जय श्री राम! जय सन्त कबीर!
आज जब मन अध्यात्म की गहराइयों में उतरना चाहता है, तब भक्तमाल के उन फूलों में से एक ऐसा फूल याद आता है जिसकी सुगंध सदियों बाद भी ताजा है। वह फूल हैं — संत कबीरदास जी।
श्री नाभादास जी महाराज ने भक्तमाल में कबीर का चरित्र अत्यंत संक्षेप में पर अत्यंत प्रभावशाली शब्दों में गूँथा है। प्रियादास जी की टीका ने उस चरित्र को और भी जीवंत बना दिया। कबीर न तो पूरी तरह हिंदू थे, न मुसलमान। वे दोनों से ऊपर उठकर केवल ‘राम’ के दीवाने थे — उस निर्गुण राम के, जो मंदिर और मस्जिद दोनों से परे है।
कबीर का जन्म और बाल्यकाल
कबीर के जन्म को लेकर अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। सबसे प्रसिद्ध कथा यह है कि काशी के लहरतारा तालाब में कमल के फूल पर एक नवजात शिशु प्रकट हुआ। नीरू नामक जुलाहा और उनकी पत्नी नीमा ने उस बालक को अपना लिया। इस प्रकार कबीर का पालन-पोषण एक मुसलमान जुलाहा परिवार में हुआ।
बचपन से ही कबीर का मन सांसारिक बातों से हटता रहा। वे ताना-बाना बुनते-बुनते ही राम-नाम जपा करते। उनकी वाणी बचपन से ही ऐसी निकली जो समाज की रूढ़ियों को चुनौती देती थी।
गुरु रामानंद का शिष्यत्व
कबीर को स्वामी रामानंद जी का शिष्य बनने की तीव्र इच्छा थी। पर रामानंद जी उस समय केवल ब्राह्मणों को दीक्षा देते थे। कबीर ने एक युक्ति निकाली। वे गंगा घाट की सीढ़ियों पर लेट गए। प्रातःकाल जब रामानंद जी स्नान करने उतरे तो उनका पैर कबीर पर पड़ गया। मुख से सहसा ‘राम’ निकल गया। कबीर ने उसी ‘राम’ को गुरु-मंत्र मान लिया और स्वयं को रामानंद का शिष्य घोषित कर दिया।
बाद में रामानंद जी ने उनकी लगन देखकर उन्हें स्वीकार कर लिया। इस प्रकार कबीर निर्गुण भक्ति की उस धारा से जुड़े जो रामानंद परंपरा से निकली थी।
कबीर की निर्भीक वाणी
कबीर की सबसे बड़ी विशेषता उनकी निर्भीकता थी। उन्होंने हिंदू और मुसलमान दोनों की रूढ़ियों पर प्रहार किया।
उन्होंने कहा —
“माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख माहीं।
मनुआँ तो चहुँ दिशि फिरै, यह तो सुमिरन नाहीं॥”
और
“कांकर पत्थर जोरि के, मस्जिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥”
कबीर ने बार-बार याद दिलाया कि भगवान न मंदिर में हैं, न मस्जिद में। वे तो हृदय में बसते हैं। जाति-पाँति, छुआछूत, ऊँच-नीच — ये सब माया के खेल हैं। सच्चा साधु वही है जिसके हृदय में प्रेम और ज्ञान का प्रकाश हो।
जीवन की परीक्षाएँ
कबीर का जीवन परीक्षाओं से भरा रहा। काशी के पंडित और मौलवी दोनों उन्हें अपना शत्रु समझते थे। कई बार उन्हें प्राणदंड देने का प्रयास किया गया, पर हर बार उनकी भक्ति ने उन्हें बचा लिया।
एक प्रसिद्ध कथा है कि जब उन्हें हाथी के पैरों तले कुचलने का आदेश हुआ, तो हाथी उनके सामने झुक गया। जब उन्हें गंगा में डुबोने का प्रयास किया गया, तो वे सुरक्षित बाहर आ गए। इन घटनाओं ने सिद्ध कर दिया कि सच्चा भक्त कभी अकेला नहीं होता।
कबीर का देहावसान
कबीर के अंतिम समय की कथा अत्यंत मार्मिक है। जब उनका अंत निकट आया तो हिंदू और मुसलमान दोनों उनके शरीर पर अधिकार जताने लगे। कबीर ने कहा — “मेरे शरीर को ढक दो और प्रतीक्षा करो।” जब चादर हटाई गई तो वहाँ केवल फूलों का ढेर मिला। आधे फूल हिंदू ले गए, आधे मुसलमान। इस प्रकार कबीर ने जीवन के अंतिम क्षण तक भी दोनों समुदायों को एकता का संदेश दिया।
कबीर हमें सिखाते हैं —
- बाहरी आडंबर व्यर्थ हैं।सच्ची भक्ति हृदय की वस्तु है।
- जाति-पाँति का कोई महत्व नहीं।भगवान केवल भाव देखते हैं।
- नाम ही सबसे बड़ा सहारा है।निरंतर नाम-स्मरण ही मुक्ति का मार्ग है।
- निर्भीकता आवश्यक है।सत्य बोलने में संकोच नहीं करना चाहिए।
- प्रेम ही परम धर्म है।हिंदू-मुसलमान का भेद मिटाकर एक ईश्वर को पहचानना ही सच्ची साधना है।
आज के युग में कबीर की प्रासंगिकता
आज जब समाज फिर से जातियों, धर्मों और विचारधाराओं में बँटा दिखाई देता है, तब कबीर की वाणी और भी अधिक आवश्यक हो गई है। वे हमें याद दिलाते हैं कि अध्यात्म की राह पर आगे बढ़ने के लिए सबसे पहले अपने भीतर के अहंकार, संकीर्णता और दिखावे को छोड़ना होगा।
कबीर की दोहे आज भी उतने ही ताजे हैं जितने पाँच सौ वर्ष पहले थे। वे हमारे अन्तर की आँखें खोलते हैं और हमें उस निर्गुण राम की ओर ले जाते हैं जो सबमें समान रूप से विद्यमान है।
जय सन्त कबीर!
जय निर्गुण राम!
जय भक्तमाल!
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