April 08, 2026

कंजूस को बचाना

गाँव का एक बहुत कंजूस आदमी नदी में गिर गया। तैरना नहीं आता था। डूब रहा था, हाथ-पैर पटक रहा था। किनारे पर भीड़ जमा हो गई। लोग चिल्ला रहे थे, “हाथ दो! हाथ बढ़ाओ! दे दो अपना हाथ!”

वह नहीं दे रहा था। दो बार डूब चुका था, तीसरी बार डूबने ही वाला था कि मुल्ला पहुँचे। उन्होंने एक नजर डाली और कहा, “सब हट जाओ। तुम नहीं जानते।”

फिर किनारे झुके, अपना हाथ बढ़ाया और जोर से चिल्लाए, “मेरा हाथ लो!”

आदमी ने तुरंत हाथ पकड़ लिया। मुल्ला ने खींचकर बाहर निकाला और लोगों से कहा, “मूर्खों, इस आदमी ने जिंदगी भर कभी कुछ नहीं दिया। वह ‘देना’ शब्द समझता ही नहीं। मरते दम तक भी ‘लेना’ सुनते ही हाथ बढ़ा देगा।”

यह हँसी की बात लगती है, लेकिन मनुष्य के पूरे स्वभाव को दिखाती है। आदमी उसी भाषा में सुनता है जिसमें वह जीता है। बाकी शब्द उसके कानों से टकराकर वापस लौट जाते हैं। पैसे की भाषा जानने वाले से प्रेम की बात करो तो वह नहीं सुनेगा। डर की भाषा जानने वाले से करुणा की बात करो तो समझ नहीं पाएगा। और जो सिर्फ लेने की भाषा जानता है, उसे देने की बात करो तो डूबेगा लेकिन हाथ नहीं बढ़ाएगा। भीड़ सही शब्द बोल रही थी—“हाथ दो”—लेकिन सही होना काफी नहीं। मुल्ला ने उसकी भाषा बोली और बचा लिया। यही गुरु का लक्षण है। गुरु तुम्हें वहीं मिलते हैं जहाँ तुम खड़े हो, जहाँ होना चाहिए वहाँ नहीं। अगर तुम पैसे के पीछे भाग रहे हो तो वे पैसे की भाषा से शुरू करते हैं। पहले हाथ पकड़ते हैं, बाहर निकालते हैं, फिर बदलाव शुरू होता है।

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