गाँव का एक आदमी मुल्ला को बचपन से जानता था। एक दिन पूछा, “मुल्ला, तुम्हारी उम्र क्या है?”
मुल्ला बोले, “चालीस साल।”
आदमी हैरान, “अजीब बात है। मैंने दस साल पहले भी यही पूछा था, तब भी तुमने चालीस कहा था।”
मुल्ला गर्व से बोले, “बिल्कुल सही। मैं एक बार जो कह दूँ उस पर अडिग रहता हूँ। मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो आज कुछ कहें, कल कुछ और। मेरी बात में स्थिरता है।”
कितना सुंदर धोखा है। मुल्ला अपने झूठ को गुण बना रहे हैं—“देखो, मैं कितना स्थिर आदमी हूँ।” मनुष्य ने धर्म के साथ भी यही किया। हजारों साल से वही बात दोहराई जा रही है और उसे स्थिरता, परंपरा, शाश्वत कहा जाता है। लेकिन रुककर पूछो—क्या वह सच है या सिर्फ इतनी बार दोहराया गया कि सच लगने लगा? दोहराने से सत्य नहीं बनता। झूठ हजार बार बोलो तो बड़ा झूठ बन जाता है, सत्य नहीं। और गहरी बात—आदमी अपनी उम्र को वहीं रोकना चाहता है जहाँ सुविधा हो। शरीर बूढ़ा हो रहा है, भीतर तुम बीस साल की जिद, गुस्से, जलन पर अटके हो। उम्र अपने आप बढ़ती है, परिपक्वता जागरूकता और अनुभव से आती है। अस्सी साल का आदमी भी उन्हीं बातों पर गुस्सा करता है जिन पर आठ साल का बच्चा। सिर्फ बहाना बदल जाता है, बीमारी वही रहती है।
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