एक दिन मुल्ला राजा के दरबार में पहुँचे। सिर पर ऐसी चमकदार, भव्य पगड़ी थी कि पूरा दरबार देखता रह गया। राजा की निगाहें भी अटक गईं। उन्होंने पूछा, “मुल्ला, यह पगड़ी कमाल की है। कितने की खरीदी?”
मुल्ला ने साफ कहा, “एक हजार अशर्फियाँ, हुजूर।”
दरबार में सन्नाटा छा गया। मंत्री ने झुककर राजा के कान में फुसफुसाया, “हुजूर, यह आदमी पागल है। इतनी महँगी पगड़ी कोई मूर्ख ही खरीदेगा।”
राजा ने जोर से कहा, “मुल्ला, एक हजार अशर्फियाँ? हमने कभी इतनी महँगी पगड़ी न देखी न सुनी। क्यों दी इतनी?”
मुल्ला ने बहुत साधारण स्वर में जवाब दिया, “हुजूर, इसलिए दी क्योंकि मैं जानता था कि पूरी दुनिया में एक ही राजा है जो इसकी असली कीमत समझ सकता है। जब यह पता था तो एक हजार भी सस्ता सौदा था।”
राजा का अहंकार फूल गया। उन्होंने तुरंत दो हजार अशर्फियाँ दिलवा दीं और कहा, “यह आदमी पारखी है।”
बाहर निकलते समय मंत्री ने दाँत पीसते हुए कहा, “तुमने क्या कर दिया? मैं पगड़ियों की कीमत अच्छी तरह जानता हूँ।”
मुल्ला बोले, “तुम पगड़ी की कीमत जानते हो। मैं राजाओं की कमजोरी जानता हूँ।”
इस कहानी में असली मूर्ख कौन है? पगड़ी शायद दस अशर्फियों की रही होगी, लेकिन राजा ने दो हजार अपनी तारीफ के लिए दिए। अहंकार दुनिया का सबसे महँगा ग्राहक है। वह अपनी प्रशंसा किसी भी कीमत पर खरीदने को तैयार रहता है। इसलिए चापलूसों की कभी कमी नहीं होती। तुम भी वही करते हो—जो तुम्हारी तारीफ करे उसे होशियार समझते हो, जो आलोचना करे उसे जलन वाला। तुमने बुद्धिमत्ता की कसौटी ही यह बना ली है कि वह मेरे बारे में क्या सोचता है। जो इस जाल में फँसता है, उसके चारों तरफ सिर्फ झूठ रह जाता है। सच बोलने वाले को सजा मिलती है, झूठ बोलने वाले को इनाम। सबसे बड़े बादशाह भी इसी तरह अंधे हो गए।
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